भारत की आजादी के समय डॉलर और रूपये की कीमत बराबर थी,...

भारत की आजादी के समय डॉलर और रूपये की कीमत बराबर थी, जानिए! समय के साथ क्यों गिरी रूपये की कीमत

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भारत की आजादी के समय डॉलर और रूपये की कीमत बराबर थी, जानिए! समय के साथ क्यों गिरी रूपये की कीमत: एक समय था जब डॉलर और रूपये की कीमत बराबर हुआ करती थी| जी हाँ, अपने बिल्कुल ठीक पढ़ा है| एक समय था जब 1 डॉलर की कीमत 1 रूपये के बराबर हुआ करती थी| लेकिन आज एक डॉलर की कीमत 72.52 रुपए पहुँच चुकी है| यह भारत की आजादी का समय था जब डॉलर और रुपया की कीमत बराबर थी लेकिन भारत की आजादी के बाद डॉलर की कीमत में देखते ही देखते बढ़ोतरी हुई की आज 1 डॉलर 70 रूपये से अधिक का हो गया है|

भारत की आजादी के समय डॉलर और रूपये की कीमत बराबर थी, जानिए! समय के साथ क्यों गिरी रूपये की कीमत

1947 में डॉलर की कीमत

जब भारत आजाद हुआ था तब भारत पर किसी प्रकार का कोई कर्ज नहीं था| ब्रिटिश सरकार के शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी यहाँ पर बिज़नेस किया करती थी| आजादी से पहले भारत ब्रिटिश हुकूमत का उपनिवेश रहा| उस दौरान रूपये और डॉलर का प्रयोग होता था और यही वजह थी की दोनों की कीमत बराबर थी|

1 डॉलर की कीमत

लेकिन आजादी के बाद भारत एक नया देश बना| देश में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए पैसो की जरुरत थी और यह कर्ज लिए बिना मुमकिन नहीं था| साल 1951 में जब पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की गई तो तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू ने इसके लिए विदेशों से कर्ज लिया|

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अक्टूबर 2013 में एक RTI के जवाब में आरबीआई ने बताया की 18 सितंबर 1949 तक रुपए और पाउंड की वैल्यू बराबर थी| लेकिन समय के साथ पाउंड की वैल्यू कम हो चलाई गई और फिर रुपया भी गिरता चला गया गया|

भारत विकाशील देश होने की वजह से भारत के लिए इंपोर्ट पर लगाम लगाना मुश्किल हो गया| परिणामस्वरूप भारत को डॉलर एक्सपोर्ट करने होने की जगह इम्पोर्ट करने पड़े| भारत का विदेश कर्ज साल 1960 में अपने सबसे उच्चतम स्तर पर पहुँच गई| 1950 से लेकर 1960 के मध्य तक एक डॉलर की कीमत 4.79 रुपए थी|

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डॉलर और रूपये की कीमत में अंतर इंपोर्ट ही मुख्य नहीं रहा, पाकिस्तान के साथ युद्ध ने भी भारत का खर्च बढ़ा दिया| साल 1965 में हालात ये हो गए की खर्चा बढ़ गया और आमदनी कम हो गई| इस दौरान चीन के साथ युद्ध और फिर उसके तुरंत बाद पाकिस्तान से युद्ध जिसने भारत के खर्चों को बढ़ा दिया| इन युद्ध का परिणाम यह हुआ की भारत की मजबूरन विदेशी कर्ज लेना ही पड़ा|

भारत की आजादी के बाद के कुछ दशक काफी मुश्किल भरे रहे| इस दौरान भारत में सूखा की समस्या भी आई| जिसकी वजह से भारत को डॉलर में कर्ज लेना पड़ा और महंगाई बढ़ी| नेहरू सरकार के पास अब रूपये की कीमत गिराने के सिवाए कोई ओर विकल्प नहीं बचा| 1966 में भारत सरकार ने रुपए की वैल्यू गिराकार 7.57 रुपए प्रति डॉलर दी|

1990 में हुए पहले खाड़ी युद्ध के बाद कच्चे तेल की कीमत में इजाफा हुआ और फिर सोवियत यूनियन के टूटने से हालात ओर भी बदतर हो गए| ऐसे में रूपये के महंगाई की कमर तोड़कर रख दी| जून 1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 112.40 करोड़ डॉलर पर पहुँच गया| विदेशी मुद्रा भंडार का मतबल डॉलर से है| जिस देश के पास जितना ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार होता है| उस देश की अर्थव्यवस्था उतनी ही अच्छी मानी जाती है|

2007 तक रुपया टूटकर 39 रुपए प्रति डॉलर पर आ गया था. लेकिन इसके  बाद 2008 की क्राइसिस के बाद डॉलर कमजोर हुआ. 2008 के अंत तक रुपया 51 रुपए पर आ गया था. अब वेनेजुएला और तुर्की में उथलपुथल की वजह से रुपया गिरकर 72.52 पर आ गया है|