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Indira Ekadashi 2019: जानिए इंदिरा एकादशी कब है? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, महत्व

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Indira Ekadashi 2019: जानिए इंदिरा एकादशी कब है? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, महत्व इस साल इंदिरा एकादशी 25 सितंबर 2019 को पड़ रही है। हर साल इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष में पड़ती है। इसका एक विशेष महत्व है। इंदिरा एकादशी के दिन शालिग्राम की पूजा करके व्रत रखने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है की इस दिन सच्चे मन भाव से इंदिरा व्रत रखा जाए तो पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ऐसी भी मान्यता है की अगर किसी के पूर्वज जाने-अनजाने किए गए किसी पाप की सजा भोग रहे हो तो इस दिन पूरे विधि और विधान के सा पूजा अर्चना करने और व्रत रखकर मुक्ति दिलाई जा सकती है। तो चलिए अब जान लेते है की इंदिरा एकादशी 2019 शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्‍व..

Indira Ekadashi 2019: जानिए इंदिरा एकादशी कब है? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, महत्व
Indira Ekadashi 2019: जानिए इंदिरा एकादशी कब है? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, महत्व

इंदिरा एकादशी 2019 कब है? (Indira Ekadashi Kab Hai)

हिन्दू पंचांग अश्चिन मास के कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक इंदिरा एकादशी हर साल सितंबर महीने में आती है। लेकिन हर बार इसकी तारीख हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक अलग-अलग होती है। इस साल इंदिरा एकादशी 25 सितंबर को पड़ रही है।

इंदिरा एकादशी का शुभ मुहूर्त क्या है? (Indira Ekadashi Ka Shubh Muhurat)

इंदिरा एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त
इंदिरा एकादशी की तिथि: 
23 सितंबर 2019
एकादशी तिथि आरंभ: 24 सितंबर 2019 को शाम 04 बजकर 52 मिनट से
एकादशी तिथि समाप्‍त: 25 सितंबर 2019 को दोपहर 02 बजकर 09 मिनट तक
द्वादशी को पारण का समय: 26 सितंबर 2019 को सुबह 06 बजकर 15 मिनट से सुबह 08 बजकर 38 मिनट तक

इंदिरा एकादशी का महत्‍व क्या है?
(Indira Ekadashi Ka mahatva)

पितृ पक्ष में पड़ने की वजह से इंदिरा एकादशी का विशेष महत्‍व है. पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत करने से एक करोड़ पितरों का उद्धार होता है और स्‍वयं के लिए स्‍वर्ग लोक का मार्ग बनता है। मान्‍यता है कि एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा भी मिलती है।

इंदिरा एकादशी की पूजा विधि (Indira Ekadashi Puja Ki vidhi)

 इंदिरा एकादशी के दिन सुबह उठकर स्‍नान करें और स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण कर लें.
 अब व्रत का संल्‍प लेते हुए कहें,  “मैं सार भोगों का त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करुंगा/करुंगी, हे प्रभु! मैं आपकी शरण में हूं आप मेरी रक्षा करें.”
 अब शालिग्राम को पंचामृत से स्‍नान कराकर वस्‍त्र पहनाएं.
 शालिग्राम की मूर्ति के सामने विधिपूर्वक श्राद्ध करें.
 अब धूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि से भगवान ऋषिकेश की पूजा करें.
 पात्र ब्राह्मण को फलाहारी भोजन कराएं और दक्षिणा देकर विदा करें.
 दिन भर व्रत करें और केवल एक ही बार भोजन ग्रहण करें.
 दोपहर के समय किसी पवित्र नदी में जाकर स्‍नान करें.
 पूरी रात जागरण करें और भजन गाएं.
 अगले दिन यानी कि द्वादश को सुबह भगवान की पूजा करें.
 फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर उन्‍हें यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें.
 अब अपने पूरे परिवार के साथ मौन रहकर खुद भी भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें.

Indira Ekadashi Vrat Katha in Hindi

भगवान श्री कृष्ण धर्मराज युद्धिष्ठर को इंदिरा एकादशी का महत्व बताते हुए कहते हैं कि यह एकादशी समस्त पाप कर्मों का नाश करने वाली होती है एवं इस एकादशी के व्रत से व्रती के साथ-साथ उनके पितरों की भी मुक्ति होती है। हे राजन् इंदिरा एकादशी की जो कथा मैं तुम्हें सुनाने जा रहा हूं। इसके सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।

आगे कथा शुरु करते हुए भगवन कहते हैं। बात सतयुग की है। महिष्मति नाम की नगरी में इंद्रसेन नाम के प्रतापी राजा राज किया करते थे। राजा बड़े धर्मात्मा थे प्रजा भी सुख चैन से रहती थी। धर्म कर्म के सारे काम अच्छे से किये जाते थे। एक दिन क्या हुआ कि नारद जी इंद्रसेन के दरबार में पंहुच जाते हैं। इंद्रसेन उन्हें प्रणाम करते हैं और आने का कारण पूछते हैं। तब नारद जी कहते हैं कि मैं तुम्हारे पिता का संदेशा लेकर आया हूं जो इस समय पूर्व जन्म में एकादशी का व्रत भंग होने के कारण यमराज के निकट उसका दंड भोग रहे हैं। अब इंद्रसेन अपने पिता की पीड़ा को सुनकर व्यथित हो गये और देवर्षि से पूछने लगे हे मुनिवर इसका कोई उपाय बतायें जिससे मेरे पिता को मोक्ष मिल जाये। तब देवर्षि ने कहा कि राजन तुम आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो और इस व्रत के पुण्य को अपने पिता के नाम दान कर दो इससे तुम्हारे पिता को मुक्ति मिल जायेगी। उसके बाद आश्विन कृष्ण एकादशी को इंद्रसेन ने नारद जी द्वारा बताई विधि के अनुसार ही एकादशी व्रत का पालन किया जिससे उनके पिता की आत्मा को शांति मिली और मृत्यु पर्यंत उन्हें भी मोक्ष की प्राप्ति हुई।

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