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शुभ छोटी दिवाली पूजा विधि लक्ष्मी पूजन समय कैसे करे गणेश पूजा मंत्र

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शुभ छोटी दिवाली पूजा विधि लक्ष्मी पूजन समय कैसे करे गणेश पूजा मंत्र :छोटी दिवाली बड़ी दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाने वाले त्यौहार है। छोटी दिवाली को नर्क चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। नरक चतुर्दशी आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला त्यौहार है। इस दिन को बड़ी दिवाली के मुकाबले छोटे स्तर पर मनाया जाता है। इस दिन भी कुछ दिए एवं पटाखे जलाये जाते हैं।

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छोटी दिवाली की सुबह सभी महिलाएं अपने घर की साफ़ सफाई करके घर के मुख्य द्वार पर यानी ‘दरवाजे’ पर रंगोली बनाती हैं। चावल के आटे के पेस्ट और लाल रंग के सिन्दूर के साथ पूरे घर में छोटे छोटे पैर बनाये जाते हैं। ये दिवाली पर किये जाने वाले कार्यों में से सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। हिन्दू परिवारों में दिवाली से एक दिन प्रायः वाले इस त्यौहार के दिन भगवान् राम और लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। पूजा के समय भगवान् को समर्पित होने वाले गान गाए जाते हैं।

वर्ष 2016 में छोटी दिवाली 29 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

छोटी दिवाली पर किये जाने वाले रीती रिवाज़ ?

धनतेरस के बाद और बड़ी दिवाली से एक दिन पहले मनाये जाने वाले इस त्यौहार को हिन्दू समाज में बहुत हम दर्ज दिया गया है। सभी हिन्दू परिवारों के लिए ये त्यौहार बहुत ही महत्वपूर्ण है।

छोटी दिवाली के दिन महिलाएं सुबह उठकर पूरे घर की साफ़ सफाई करती हैं। उसके बाद पूरे घर को फूलों से सजाती हैं और घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाती हैं। शाम के समय भगवान् राम एवं लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और भजन भी गाये जाते हैं।

देवी लक्ष्मी के पूजन के बाद घर की अलग अलग दिशाओं में दिए जलाये जाते हैं। जिसमें से एक तुलसी के पौधे के पास रखा जाता है, दूसरा मुख्य के पास , एक पानी के स्तोत्र के पास जो कि घर में पानी की टंकी हो सकती है। और पाचवां दिया मवेशियों के कमरे में रखा जाता है। घर के सभी छोटे बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं।

छोटी दिवाली से जुड़ा इतिहास

नरकासुर वध कथा

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विष्णु पुराण में नरकासुर वध की कथा का उल्लेख मिलता है। विष्णु ने वराह अवतार धारण कर भूमि देवी को सागर से निकाला था। द्वापर युग में भूमि देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। अत्यंत क्रूर असुर होने के कारण उसका नाम नरका सुर पड़ा।

प्रागज्योतिषपुर का राजा बना और उसने देवताओं और मनुष्यों को बहुत तंग कर रखा था। उसने गंधर्वों और देवों की सोलह हजार अप्सराओं को नरकासुर ने अपने अंत:पुर में कैद किया। नरकासुर एक बार अदिति के कर्णाभूषण उठाकर भाग गया। इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर की नगरी पर अपनी पत्नी सत्यभामा और साथी सैनिकों के साथ भयंकर आक्रमण किया।

इस युद्ध में उन्होंने मुर, हयग्रीव और पंचजन आदि राक्षसों का संहार करने के बाद कृष्ण ने लड़ते-लड़ते थक कर क्षण भर को अपनी आँखें बन्द कर ली तो नरकासुर ने हाथी का रूप धारण कर लिया।सत्यभामा ने उस असुर से लोहा लिया और नरकासुर का वध किया।

श्रीकृष्ण ने वध के बाद किया था, और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को राक्षसों के चंगुल से छुड़ाया था। इसलिए भी यह त्योहार मनाया जाता है। इसलिए इस त्योहार का नाम नरक चौदस पड़ा।

वामन अवतार और राजा बलि की कथा

राजा बलि अत्यंत पराक्रमी और महादानी था। देवराज इंद्र उससे डरते थे। उन्हें भय था कि कहीं वह उनका राज्य न ले ले। इसीलिए उन्होंने उससे रक्षा की भगवान विष्णु से गुहार लगाई। तब भगवान विष्णु ने वामन रूप धर कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांग ली और उसे पाताल लोक का राजा बना कर पाताल भेज दिया।दक्षिण भारत में मान्यता है कि ओणम के दिन हर वर्ष राजा बलि आकर अपने पुराने राज्य को देखता है। विष्णु भगवान की पूजा के साथ-साथ राजा बलि की पूजा भी की जाती है। नरक चौदस के दिन दीपक जलाने से वामन भगवान खुश होते हैं तथा मनचाहा वरदान देते हैं।