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आज से शुरू हुई जगन्नाथ यात्रा, पढ़िए! भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़े रोचक तथ्य

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आज से शुरू हुई जगन्नाथ यात्रा, पढ़िए! भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़े रोचक तथ्य: ओडिसा के पुरी धाम से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा हर साल निकाली जाती है| जगन्नाथपुरी का वर्णन स्कन्द पुराण के साथ-साथ नारद पुराण में भी किया गया है। जगन्नाथ शब्द का मतलब है जगत का स्वामी| यह विश्वप्रसिद्ध यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को शुरू होती है। हर साल भगवान जगन्नाथ की यात्रा को देखने देश विदेश से श्रद्धालु आते है|

आज से शुरू हुई जगन्नाथ यात्रा, पढ़िए! भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़े रोचक तथ्य

श्री जगन्नाथ मंदिर 12वीं शताब्दी में बना था जिसके सामने तीन विशाल रथ साज-सजावट के बाद खड़े खड़े किए जाएँगे| इस रथ को हजारों की संख्या में में लोग रस्सियों के सहारे अपने हाथों से खींचते है| ऐसी मान्यता है की इस रथ को खींचने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है|

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यह तीनों रथ भगवान जगन्नाथ, भाई बलराम जी और उनकी बहन सुभद्रा जी के होते हैं। श्री जगन्नाथ जी की यह भव्‍य रथ यात्रा 9 दिनों तक चलती है। अब चलिए जानते है भगवान जन्नत जी की रथ यात्रा से जुड़े कुछ रोचक तथ्य के बारे में

– भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के आरंभ से पहले भगवान जगन्नाथ जी के रथ के सामने सोने के हत्थे वाली झाडू लगाई जाती है। जिसके बाद मंत्र उच्‍चारण और जयघोष के साथ ढोल, नगाड़े और तुरही बजा कर विशाल रथों को खींचा जाता है।

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– इन तीनों रथों में से सबसे पहले भाई बलराम जी के रथ को खींचा जाता है उस के बाद बहन सुभद्रा जी का और फिर आखिर में श्री जगन्नाथ जी का खींचा जाता है|

– इन रथों की पहचान रथ के रंग और ऊंचाई से होती है| बलरामजी के रथ का रंग लाल और हरा होता है। सुभद्रा जी के रथ का रंग काला या नीले रंग का होता है। जबकि, भगवान जगन्नाथ जी के रथ का रंग लाल और पीला होता है।

– गुंदेचा मंदिर पहुंचकर भगवान जगन्नाथ जी की यात्रा पूरी होती है| इस मंदिर को भगवान जगन्नाथ जी की मौसी का घर माना जाता है| इस मंदिर में भगवान एक हफ्ते तक रुकते है और यहाँ फिर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है|

– गुंदेचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ और उनके भाई, बहन को पकवानों का भोग लगाया जाता है| जिसके बाद भगवान जगन्नाथ बीमार भी पड़ते हैं। यही नहीं उन्‍हें पथ्य का भोग लगा कर जल्‍द ठीक भी कर दिया जाता है।

– भगवान जगन्नाथ आषाढ़ माह के दसवें दिन पुरी के लिए प्रस्थान करते हैं। रथों की वापसी की रस्‍म को बहुड़ा यात्रा कहा जाता हैं। यात्रा समाप्‍त होने के बाद भी तीनों देवी-देवता रथ में ही रहते हैं। फिर दूसरे दिन एकादशी को इन्‍हें मंदिर में प्रवेश करवाया जाता है|